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  3. 1 मई 2026

टीचर और मज़दूर, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं

यह मूल फ़ारसी पाठ का अनुवाद है। मूल फ़ारसी पाठ

इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता का पैग़ाम इस प्रकार हैः

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम

पहली और दूसरी मई के दो दिन , ऐसे दिन हैं जिन में मज़दूर वर्ग और शिक्षकों की क़द्रदानी की जाती है। ज़बानी और सांकेतिक क़द्रदानी से हटकर , जो अपने आप में एक सही व उचित काम है , किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी , इल्म और अमल के दो परों की देन है। शिक्षक , इस मक़सद को हासिल करने के पहले चरण में रोल अदा करता है।

ज्ञान देने , महारत बढ़ाने और आने वाली पीढ़ी के वैचारिक विकास और उसकी पहचान के प्रारूप को ढालने की बड़ी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर है। वे स्टूडेंट्स और धार्मिक छात्र जो किसी भी उस्ताद की सरपरस्ती में परवरिश पाते हैं , निकट भविष्य में अपनी सीखी हुयी महारतों और हासिल किए गए ज्ञान को व्यावहारिक बनाएंगे और इंशा अल्लाह ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ मैदानों , घर के मोहब्बत भरे माहौल से लेकर काम की जगहों , गलियों तक अपने शिष्टाचार , रवैये और बातचीत में अपने टीचर के किरदार और व्यवहार की झलक पेश करेंगे।

दूसरी तरफ़ काम का मैदान एक विशाल मैदान है जिसका दायरा पूरे मुल्क में फैला हुआ है , घरों , दफ़्तरों , कारोबारी केन्द्रों और मस्जिदों से लेकर खेतों , वर्कशॉप्स , कारख़ानों , खदानों और सेवा के अनेक विभागों तक फैला हुआ है।  जितना ज़्यादा यह विशाल मैदान मेहनत और ज़िम्मेदारी की भावना जैसे दो बुनियादी तत्वों से सजा होगा , जो हर बड़ी कामयाबी की बुनियाद है , मुल्क उतनी ही ज़्यादा तरक़्क़ी करेगा और मुल्क की तरक़्क़ी की गारंटी बेहतर होगी।

हम जानते हैं कि एक मेहनती इंसान अपने इरादे और अच्छे काम से कभी कभी ऐसा ऊंचा स्थान हासिल कर लेता है कि एक मेहरबान उस्ताद और ट्रेनर की तरह उसके सक्षम और कलात्मक हाथों को चूमना चाहिए। अलबत्ता यह आरंभिक तरबियत का नतीजा होता है जो हर इंसान को अपने सबसे पहले वाले शिक्षकों यानी अपने माँ बाप से मिलती है और उस के बाद उस्ताद से हासिल की जा सकती है।

अब जबकि इस्लामी गणराज्य ईरान ने 47 साल से ज़्यादा मुद्दत तक संघर्ष के बाद अल्लाह की कृपा से अपनी तरक़्क़ी और विकास के विरोधियों के साथ सैन्य मैदान में अपनी नुमाया ताक़त का कुछ हिस्सा दुनिया के सामने साबित कर दिया है तो आर्थिक और सांस्कृतिक मैदान में भी उन्हें मायूस करना और शिकस्त देना ज़रूरी है।

शिक्षक , सांस्कृतिक मैदान में सबसे प्रभावी कड़ी और मज़दूर आर्थिक मैदान में सब से अहम तत्व होंगे , इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह दोनों , संस्कृति और अर्थव्यवस्था के ढांचे की रीढ़ की हड्डी की हैसियत रखते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि वे अपनी ख़ास हैसियत की अहमियत को , नौकरी और काम से बढ़कर जिसे अंजाम देने के बदले में मज़दूरी मिलती है , अच्छी तरह समझते हों।

जैसा कि इस काम के साथ इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि हर साल या हर कुछ समय बाद ज़बानी क़द्रदानी करना अपनी जगह उचित है लेकिन इन दोनों वर्गों की कोशिशों की क़द्रदानी इस से कहीं ज़्यादा गहरी और व्यावहारिक होनी चाहिए। मुझे लगता है कि ईरान की अज़ीज़ क़ौम जिस तरह सड़कों और चौराहों पर मौजूदगी के ज़रिए अपनी आर्म्ड फ़ोर्सेज़ का सपोर्ट कर रही है , उसी तरह उसे शिक्षकों और मज़दूरों की मदद के लिए भी मज़बूत व्यावहारिक सपोर्ट का प्रदर्शन करना चाहिए।

जिस तरह स्कूलों , विद्यालयों और यूनिवर्सिटियों के संचालन में छात्रों के घर वालों का सहयोग पहले से ज़्यादा होना चाहिए , उसी तरह मुल्क में तैयार होने वाली वस्तुओं के इस्तेमाल को प्राथमिकता देकर उन का प्रोडक्शन करने वाले मज़दूरों ख़ास तौर पर नुक़सान उठाने वाले व्यापारियों और कारोबारियों का सपोर्ट किया जाना चाहिए ताकि वे जितना मुमकिन हो कर्मचारियों की छटनी न करें , चाहे वे प्रोडक्शन यूनिट के हों या सेवा इकाई के , बल्कि हर मज़दूर को जहाँ वह काम करता है , उस प्रोडक्ट या सर्विस इकाई की संपत्ति समझें। अलबत्ता सरकार को भी इस भले काम का जितना मुमकिन हो सपोर्ट करना चाहिए।

अज़ीज़ ईरान , जैसा कि वह बरसों कोशिश के बाद एक सैन्य ताक़त के रूप में उभरा है , इंशा अल्लाह उसी तरह ईरानी-इस्लामी पहचान का ख़ाका बनाकर और उन्हें शिक्षकों के ज़रिए नौजवानों के दिल दिमाग़ में बिठाकर और स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल को प्राथमिकता देकर , जो ईरानी मज़दूरों की कोशिशों का नतीजा हैं , तरक़्क़ी व विकास की चोटियों की ओर बढ़ता रहेगा और यह सब इंशाअल्लाह , हमारे आक़ा इमाम महदी कि अल्लाह उन्हें जल्द से जल्द ज़ाहिर करे , की दुआ और वसीले से बहुत जल्द और बेहतर तरीक़े से अंजाम पाएगा। महान अल्लाह की इजाज़त से।

सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई

1 मई 2026